Ghazal

Published by Dr. Amit Singh

August 13, 2020

वादे से इक तुम्हारे मजबूर हो गये
ख़ातिर तुम्हारी तुम से हम दूर हो गये

ख़्वाहिश हमारे दिल की दिल ही में रह गई
अरमाँ-ए-यार आगे मा’ज़ूर हो गये

बर्क़-ए-जमाल-ओ-हुस्न-ए-माशूक़ देखिए
ख़ुर्शीद जाने कितने बे-नूर हो गये

इक आरज़ू-ए-उल्फ़त बदनाम कर गई
वो इश्क़ कर लिये और मशहूर हो गये

उनकी जिरह के आगे मेरी दलील क्या
सारे सुबूत भी ना-मंज़ूर हो गये

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नारी

मुझे मेरी उङान ढूँढने दो।
खोई हुई पहचान ढूँढने दो।

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