Ghazal

Published by Dr. Amit Singh

August 13, 2020

इक दौर-ए-कर्ब में अब सारा मिरा जहाँ है
बिन यार जल रही शब, दिन भी धुआँ धुआँ है

दर-दर भटक रहा हूँ मैं यार की फ़िकर में
मेरे ख़ुदा बता मेरी ज़िन्दगी कहाँ है

ज़ुल्म-ओ-सितम जहाँ का उसके नहीं मुक़ाबिल
नाला-ए-हिज्र में जो ग़म एक अब निहाँ है

है दूर यार जो तो बेहाल हाल-ए-दिल है
है चश्म तर-ब-तर और वीराँ हुआ मकाँ है

मंज़िल नहीं रही अब जो मुंतज़िर हमारी
ईजाद मेरे दिल पर इक ज़ख्म का निशाँ है

वादा-ए-वस्ल है सो ज़िन्दा यहाँ हूँ वर्ना
ये ज़ीस्त, मौत की बस इक और तर्जुमाँ है

ज़ख़्मी हुआ हूँ मैं ख़ुद अपने फ़साद-ए-दिल से
इक दीद-ए-यार ख़ातिर मुश्किल में मेरी जाँ है

क़तरा-ए-इश्क़ की है इक आरज़ू जिगर में
शम्स-ओ-क़मर नहीं न अब ख़्वाहिश में आसमाँ है

चैन-ओ-क़रार क्या, क्या मसरूफ़ियत जहाँ की
जो पास तुम नहीं तो ये ज़ीस्त रायगाँ है

है यार जो हमारा अब दूर काफ़िले से
ठहरा हुआ सफ़र है ग़मगीन कारवाँ है

आग़ाज़-ए-ज़िन्दगी से अंजाम-ए-ज़िन्दगी तक
कुछ और क्या सफ़र में बस दर्द दरमियाँ है

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मुझे मेरी उङान ढूँढने दो।
खोई हुई पहचान ढूँढने दो।

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