शहर

Published by Prem Das Sharma

August 15, 2020

इंसान की नहीं,
यहाँ,
हैसियत की क़दर है

लौट चल गाँव

ये तो
मशीनों का शहर है

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नारी

मुझे मेरी उङान ढूँढने दो।
खोई हुई पहचान ढूँढने दो।

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1 Comment

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    शहरी जीवन की संवेदनहीनता और यांत्रिक अस्तित्व का यथार्थ चित्रण

    बहुत गहरा कहा प्रेम जी

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