माँ

Published by Bhrigunath chaurasia

I am a seeker, who wants to travel the world. I love to read and am helpless to write. I want to write about the masses, the mango man in an easy and understandable way.

August 14, 2020

बस मैं चला जाऊंगा,
अब तुम जाओ,
थक जाओगी,
एक टिकट तुम्हारी कटा लूं,
साथ ही चले चलो,

‘नही तुम जाओ’
मैं जा रही वापस(घर)….

चार कदम चलना,
और पीछे मुड़-मुड़ कर देखना,
कैसे भुलाया जायगा उसका मुड़कर देखना,

हर बार यही होता है,
हर बार बिछड़ने का गम,
मिलने की खुशी से जीत जाता है,
पर माँ हर बार सड़क तक छोड़ने आती है,
फिर वापसी में इन सकरी गलियों में कही खो जाती है।

Recently Published:

ग़ज़ल

जो राह-ए-मुहब्बत न नज़र आई ज़रा और
छाई दिल-ए-माायूस पे तन्हाई ज़रा और

read more

Writer’s Block

Despite being a constant juggler of different roles that I play in my day-to-day life, the only thing I can really identify myself with is, being a writer.

read more

0 Comments

%d bloggers like this: