तैराकी

Published by Baraj

August 15, 2020

बगैर तैराकी के जिनकी पीठ थपथपाई गयी
वे उतरे जरूर दरिया में मगर लौटके नही आये

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नारी

मुझे मेरी उङान ढूँढने दो।
खोई हुई पहचान ढूँढने दो।

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1 Comment

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    बराज़ साब आपकी ये पंक्तियाँ नीति काव्य परंपरा का विस्तार हैं।

    बहुत बड़े और बहुत गहरे जीवन दर्शन को आपने निचोड़ कर दो पंक्तियों मे लिख दिया

    मेरी पसंदीदा पंक्तियाँ हैं ये,प्रेरणा देती हैं।

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