तैराकी

Published by Baraj

August 15, 2020

बगैर तैराकी के जिनकी पीठ थपथपाई गयी
वे उतरे जरूर दरिया में मगर लौटके नही आये

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जंगल का फूल

पौधे और झाड़ियां तो बगिया की शान हैं,
पर फूलों में ही रहती, बगिया की जान है।

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ख़ूबसूरत मोड़

ये भूली बिसरी बातें और यादें उस सफ़र की थी
था मुनफ़रिद मैं राह पर, न चाह मुस्तक़र की थी

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نظم

مختصر کہانی جسکےمختلف جہات
کچھ حسین یادیں ،اک حسین واردات

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1 Comment

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    बराज़ साब आपकी ये पंक्तियाँ नीति काव्य परंपरा का विस्तार हैं।

    बहुत बड़े और बहुत गहरे जीवन दर्शन को आपने निचोड़ कर दो पंक्तियों मे लिख दिया

    मेरी पसंदीदा पंक्तियाँ हैं ये,प्रेरणा देती हैं।

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