ग़ज़ल

Published by Editor-in-Chief

August 14, 2020

पासे बह के रोणा की
दिल दे ढायां होणा की

इश्क़ समूला चाहीदै
अध्धा की ते पोणा की

नफ़रत वस्से वेहड़े विच
बूहे तेल दा चोणा की

मुड़ मुड़ कीतीयां भुलां नूं
गंगा जा के धोणा की

दिन दे चड़ेयां आज़िम जी
मक्कर मार के सोणा की

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नारी

मुझे मेरी उङान ढूँढने दो।
खोई हुई पहचान ढूँढने दो।

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