Hindi 

ग़ज़ल

जो राह-ए-मुहब्बत न नज़र आई ज़रा और
छाई दिल-ए-माायूस पे तन्हाई ज़रा और

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औरत

शर्म से निकले बगैर
औरत घर से नही निकल सकती

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अनन्त

जो परिभाषित नहीं हो सकता,
वही अनन्त है फ़िर प्रेम हो या ईश्वर

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