यादें

आया वो याद हम को बोसा क़ज़ा से पहलेलम्हे नवाज़िशों के जैसे सज़ा से पहले आया न बाज़ आदम क्यों हर ख़ता से पहलेतू कर सवाल ये अब वाइज़ ख़ुदा से पहले अंदाज़-ए-इश्क़ उनका देखो तो क्या अजब थाकरते रहे जफ़ा वो हर इक वफ़ा से पहले जब निकहत-ए-सबा का पूछा सबब तो बोलीगुल पुर-शमीम था इक...

रूहानियत

क्यूँ धीरे धीरे मुझे दिल पे कम यकीं हो चला हैक्यूँ  रफ़्ता रफ़्ता जो महमान था मकीं हो चला हैन आरज़ू, न तमन्ना, न दिल में कोई भी हसरतयूँ मुतमइन हो के दिल तेरे और करीं हो चला हैजुनून इश्क़ का इस तरह से शदीद हुआ अब    कि बद-दुआ’ भी ज़ुबा से यूँ...